रामधारी सिंह दिनकर
“कलम, आज उनकी जय बोल!” हिंदी साहित्य-जगत में कुछ रचनाकार ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं, विचारों और शब्दों की अमिट छाप से समय की सीमाओं को लाँघते हुए आने वाली पीढ़ियों के हृदय में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है।रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ऐसे ही युगद्रष्टा रचनाकार थे। उनके शब्दों में जहाँ स्वतंत्रता की आकांक्षा…
हिंदी : एक भाषा, एक सांस्कृतिक यात्रा
भारत की पावन धरती पर न जाने कितनी सभ्यताओं ने जन्म लिया, कितनी संस्कृतियाँ विकसित हुईं और कितने विचारों ने मानवता को नई दिशा दी। वेदों की ऋचाओं से लेकर उपनिषदों के दर्शन तक, रामायण-महाभारत की कथाओं से लेकर संतों की वाणी तक और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक—हमारी…
हिंदी : भारत की पहचान
भारत की पावन धरती पर,जिसने स्वर का रूप लिया,जन-जन के मन की बात कही,हिंदी ने विस्तार लिया। कबीर ने इसमें सत्य कहा,मीरा ने प्रेम सुनाया है,तुलसी ने मर्यादा रचकर,जन-जन को राह दिखाया है। जैसी मन में उठती वाणी,वैसी ही यह लिखती है,सच्चे, सरल और सहज भाव से,मन की बातें कहती है। दुःख में बनती सांत्वना,सुख…
मुंशी प्रेमचंद : भारतीय जनजीवन के अमर इतिहासकार
“साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, उसका पथप्रदर्शक भी है।” यह उक्ति यदि किसी साहित्यकार के समूचे रचनात्मक व्यक्तित्व पर अक्षरशः चरितार्थ होती है, तो वे निस्संदेह मुंशी प्रेमचंद हैं। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन अथवा सौंदर्यबोध का साधन नहीं माना, बल्कि उसे समाज-परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया। जिस समय हिंदी साहित्य तिलिस्म, ऐयारी, कल्पनालोक…
कबीर : एक समग्र मूल्यांकन
भारतीय साहित्य के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं जो किसी एक युग, सम्प्रदाय या विचारधारा की सीमाओं में नहीं बँधते। वे समय की धारा को पार कर प्रत्येक पीढ़ी से संवाद करते हैं और हर नए युग में नए अर्थों के साथ हमारे सामने उपस्थित होते हैं। कबीर ऐसे ही कालजयी कवि हैं। वे…
सवाल दो जून के रोटी की
समय बदल गया, सरकारें बदल गईं, तकनीक बदल गई, जीवन की रफ्तार बदल गई। बैलगाड़ी से बुलेट ट्रेन तक और चिट्ठियों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का सफर तय हो गया। लेकिन करोड़ों लोगों के जीवन में एक सवाल ऐसा है जो आज भी अपनी जगह से नहीं हिला—दो जून की रोटी का सवाल।आजकल सोशल मीडिया…
निराला का काव्य और कथा साहित्य: एक समग्र अध्ययन
हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद का युग स्वर्णिम अध्याय के रूप में प्रतिष्ठित है और उसके चार प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे केवल महाप्राण कवि ही नहीं, बल्कि समर्थ कथाकार, उपन्यासकार और निबंधकार भी थे। हिंदी कविता को परंपरागत बंधनों से मुक्त कर मुक्तछंद को…
एक सहयात्री
“कई वर्ष बीत जाते हैं, पर कुछ यात्राएँ समय की धूल में नहीं दबतीं। वे स्मृति के किसी कोमल कोने में सुरक्षित रहती हैं और जीवन के किसी अनपेक्षित क्षण में अचानक सामने आ खड़ी होती हैं। आज ऐसा ही एक क्षण आया—और उसके साथ लौट आई पटना से कटिहार तक की वह रेलयात्रा, जिसमें…
परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी
✒️ कुन्दन समदर्शी परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी,साँझ की उन -पगडंडियों सीजहाँ धूप थककर पेड़ों के तलेचुपचाप बैठ जाती है। हर कदम पर स्मृतियों कीकोमल पत्तियाँ चटकती हैं—कुछ पीली, कुछ अभी भी हरी,जैसे समय ने उन्हेंपूरा विदा करना भूल गया हो। हम तेज़ चले,कि कहीं यह न दिखेकि भीतर एक नन्हा-सा मनअब भी किसी पुराने…
जीवन : एक अनवरत यात्रा
जीवन किसी स्थिर चित्र या जड़ संरचना का नाम नहीं है। वह तो एक निरंतर बहती हुई धारा है—जिसमें ठहराव नहीं, केवल प्रवाह है। इस प्रवाह में कभी संघर्षों की तीखी धूप हमें झुलसाती है, तो कभी सुकून की शीतल छाँव हमारी थकान को सहला जाती है। हर अनुभव, हर पड़ाव, हर ठोकर और हर…